
ऐतिहासिक लाला तालाब बदहाली की कगार पर: गंदगी, बंद जलमार्ग और घटते जलस्तर से बढ़ी चिंता
(मोनिका साहू की रिपोर्ट)
बालोद। नगर के हृदय में स्थित ऐतिहासिक लाला तालाब आज अपनी पहचान खोने की कगार पर पहुंच गया है। वर्षों पुराना यह जल स्रोत, जो कभी नयापारा और पांडेपारा सहित आसपास के कई मोहल्लों की जीवनरेखा हुआ करता था, अब बदहाली और उपेक्षा का शिकार बन चुका है।
एक समय था जब इस तालाब का पानी दैनिक जरूरतों का मुख्य आधार था। लोग यहां नहाने, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कार्यों के लिए आते थे। इतना ही नहीं, यह तालाब सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन वर्तमान में इसकी स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।
तालाब के चारों ओर फैली गंदगी, प्लास्टिक कचरा और बदबूदार दूषित पानी इसकी गरिमा को धूमिल कर रहे हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि जहां कभी लोग गर्व से इस तालाब का उपयोग करते थे, वहीं अब इसकी ओर जाना भी लोग टाल रहे हैं। दूषित जल के कारण बीमारियों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है, जिससे स्थानीय नागरिकों में आक्रोश और चिंता दोनों स्पष्ट नजर आ रहे हैं।
समस्या का सबसे गंभीर पहलू वह जलमार्ग है, जिसके माध्यम से तालाब में पानी की आपूर्ति होती थी। यह मार्ग अब पूरी तरह बंद हो चुका है, जिससे तालाब का जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। भीषण गर्मी के इस मौसम में स्थिति और अधिक विकट हो गई है और तालाब के सूखने का खतरा मंडरा रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ऐतिहासिक धरोहर केवल स्मृति बनकर रह जाएगी। उन्होंने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए तालाब की साफ-सफाई, कचरा हटाने और बंद पड़े जलमार्ग को पुनः चालू करने की अपील की है।
साथ ही, नागरिकों ने नियमित रखरखाव और संरक्षण की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग की है, ताकि यह जल स्रोत भविष्य में भी लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करता रहे।
लाला तालाब केवल एक जल स्रोत नहीं, बल्कि नगरवासियों की भावनाओं और इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कितनी तत्परता दिखाता है और कब तक इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।



