
बालोद/छत्तीसगढ़:
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा एक ओर जहां दुकानों, पान ठेलों और छोटे व्यापारियों को प्लास्टिक डिस्पोजल ग्लास के उपयोग पर सख्ती से रोक लगाने के निर्देश दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शराब की बिक्री में कांच की बोतलों को बंद कर प्लास्टिक (PET) बोतलों का उपयोग शुरू किया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है। इस दोहरे मापदंड से न केवल पर्यावरण बल्कि हजारों लोगों के रोजगार पर भी असर पड़ रहा है।
*पर्यावरण बनाम नीति का विरोधाभास*
सरकार का तर्क है कि प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ शराब की प्लास्टिक बोतलों से
प्लास्टिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है
नदियों और जमीन में माइक्रोप्लास्टिक फैल रहा है
जानवरों और पर्यावरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है

ऐसे में आम जनता यह सवाल उठा रही है कि जब प्लास्टिक नुकसानदायक है, तो एक क्षेत्र में प्रतिबंध और दूसरे में प्रोत्साहन क्यों?
*रोजगार पर सीधा असर*
*कांच की बोतलों के बंद होने से*
*बोतल संग्रह करने वाले (कबाड़ी, गरीब वर्ग)*
सफाई और रीसाइक्लिंग से जुड़े लोग
छोटे स्तर पर बोतल खरीद-बिक्री करने वाले व्यापारी
इन सभी का रोजगार प्रभावित हुआ है।
पहले कांच की खाली बोतलें एक आय का साधन थीं, जिनसे कई परिवारों का गुजारा चलता था। अब प्लास्टिक बोतलों में वह आर्थिक मूल्य नहीं है।
*सरकार के निर्णय के पीछे कारण*
सरकार द्वारा यह निर्णय मुख्यतः
सुरक्षा कारणों (कांच से होने वाली हिंसा रोकने)
नकली शराब पर नियंत्रण
लागत और परिवहन में कमी
को ध्यान में रखकर लिया गया है।
लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज करने का आरोप भी लग रहा है।
*जनहित में उठी मांग*
*जनहित में समर्पित जन सेवक उमेश कुमार सेन ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए कहा* कि:
सरकार को एक समान नीति अपनानी चाहिए
यदि प्लास्टिक हानिकारक है, तो हर क्षेत्र में प्रतिबंध हो
कांच की बोतल व्यवस्था को फिर से लागू कर
रोजगार और पर्यावरण दोनों की रक्षा की जाए
*निष्कर्ष*
यह मामला केवल शराब की बोतलों का नहीं, बल्कि
नीतियों की समानता, पर्यावरण संरक्षण और गरीबों के रोजगार से जुड़ा हुआ है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस जनहित के मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और क्या भविष्य में नीति में संतुलन लाया जाता है।


